Tuesday, 5 July 2016

उलझन

सपनो के जगल मे उलझा तडप किनारे की ,
अधियारे गलियो मे एक कूक उजाले की .
कलिया जीवन की चुनने को अब मन अकुलाता है ,
खोया बचपन फिर कोने ---  से पास बुलाता है .
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सुखिया के माथे की चुन्नट आखो के छाले ,
हर दिन चिंतित कर देते रस्तो मे बिलखने वाले
लेकिन निज स्वारथ के खतिर सब कुछ भुलाता हू
रोज सत्य को झूठलाता हू .
----------------- विधुभूषण
9455667248